नई दिल्लीकेंद्र सरकार ने जब राज्य सरकारों को लॉकडाउन को लेकर निर्णय करने की छूट दी तब जुलाई महीने से कई राज्य सरकारें कुछ-कुछ इलाकों में कड़ी पाबंदियां लागू करने लगीं। इसके पीछे न कोई गंभीर योजना थी और ना कुछ दूरदृष्टि। नतीजा यह हुआ कि इससे आर्थिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हो गईं, लेकिन कोविड-19 महामारी के फैलाव पर कुछ खास असर नहीं पड़ा। इन राज्यों ने लगाया लॉकडाउन कई राज्यों ने जुलाई और अगस्त महीनों में पूर्ण या आंशिक लॉकडाउन लगाया था। प. बंगाल ने 23, 25 और 29 जुलाई को पूर्ण लॉकडाउन लगाया। वहीं, उत्तर प्रदेश ने 10 से 13 जुलाई के बीच ऐसा ही किया। बिहार ने भी 16 से 31 जुलाई तक पूर्ण लॉकडाउन का ऐलान किया जबकि हरियाणा ने 21 अगस्त को वीकेंड लॉकडाउन का फैसला किया। राज्यों के मनमाने रवैये को देखकर ही केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 29 अगस्त को राज्य सरकारों से कंटेनमेंट जोन के बाहर लॉकडाउन लगाने का अधिकार वापस ले लिया। उससे पहले भी केंद्र सरकार ने राज्यों से कई बार लिखित निर्देश दिया कि वो एक जिले से दूसरे जिले और एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच लोगों और सामानों की आवाजाही नहीं रोकें। राज्यों की तरफ से लगाए गए लॉकडाउन का असर 10 जुलाई से 3 अगस्त तक के आंकड़े बताते हैं कि जिन सात इलाकों में लॉकडाउन लागू किया गया, वहां हर सप्ताह औसतन 37 से 578 प्रतिशत की दर से कोरोना केस बढ़े। लेकिन, इस दौरान सप्लाई चेन बाधित हो गया और सिस्टम में अनिश्चितिता का माहौल होने के कारण यह तय नहीं हो पाया कि लोगों को काम पर दोबारा कब बुलाया जाए और अपना कारोबार फिर से कब शुरू किया जाए। बहरहाल, इस दौरान नए केसों की राष्ट्रीय साप्ताहिक औसत वृद्धि दर 190 प्रतिशत रही। इस दर से 23,236 केस में 44,379 केस की वृद्धि हुई और कुल 67,615 केस हो गए थे। राज्यवार सूची पर नजर डालें तो महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। महाराष्ट्र, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में तो मृत्यु दर रिकवरी रेट से भी ज्यादा है। इन राज्यों में बढ़ गई वृद्धि दर देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के एक शोध के मुताबिक, प. बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, मिजोरम और महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में अगस्त के आखिर तक नए कोरोना केस में औसतन साप्ताहिक वृद्धि की दर लॉकडाउन लागू किए जाने से पहले की दर के मुकाबले बढ़ गई। एसबीआई की रिपोर्ट कहती है, 'राज्यों ने जुलाई और अगस्त में आंशिक लॉकडाउन लागू किए। हालांकि, इससे कोविड-19 केस में कमी नहीं आई। इसलिए राज्यों को मानसिक तौर पर स्वघोषित लॉकडाउन से बाहर आ जाना चाहिए।' अपने मकसद में कामयाब रहा केंद्र केंद्र सरकार ने पहले चार चरण के लॉकडाउन संक्रमण की दर पर नियंत्रण पाने और इस दौरान स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के इरादे से लगाया था। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि केंद्र सरकार इन मकसदों में कामयाब भी रही। इस दौरान कोविड टेस्टिंग कपैसिटी बढ़ गई, आइसोलेशन के बेहतर प्रावधान सामने आए, ऑक्सिजन और आईसीयू बेडों और वेंटिलेटरों की अच्छी व्यवस्था हो गई। विश्लेषकों का मानना है कि राज्य सरकारों की तरफ से घोषित लॉकडाउन से ऐसा कोई मकसद पूर्ण नहीं हुआ बल्कि पटरी पर आ रही अर्थव्यवस्था को झटका जरूर लगा। G20 देशों में सबसे कमजोर GDP डेटा भारत का साफ है कि पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा ने केंद्र सरकार के उस निर्देश को नजरअंदाज करते हुए लॉकडाउन की घोषणा की थी जिसमें कहा गया था कि लॉकडाउन पर कोई फैसला लेने से पहले केंद्र सरकार से राय-मशविरा जरूर किया जाए। बहरहाल, वित्त मंत्रालय ने अगस्त महीने की मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा कि भारत में अप्रैल-जून तिमाही में बेहद कड़ाई से लॉकडाउन लागू हुआ जिसका असर सकल घरेलू उत्पाद (GST) पर पड़ा जो 23.9% तक सिकुड़ गया। जीडीपी के मोर्चे पर भारत का यह प्रदर्शन G20 देशों में सबसे खराब है।
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बिना प्लानिंग के लॉकडाउन लगाती रहीं राज्य सरकारें और अर्थव्यवस्था पर लगने लगा ग्रहण
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9:47 AM
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